सत्य प्रेम के जो हैं रूप उन्हीं से छाँव.. उन्हीं से धुप. Powered by Blogger.
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इक पत्ती हुई डाल से ज़ुदा~!!!

एक पत्ती थी उस डाल पे
हवा के झोंके संग लहराती थी
कभी इतराती कभी बलखाती
झूम झूम ख़ुशी से गाती थी____

मौसम बदला पतझड़ आया
डाल ने अपना धर्म निभाया
ज़मी पे पड़ी रही वो पत्ती
सुखती रही कुचली गयी
हवा के झोंकों संग फिर वो
भटकती रही भटकती रही_____

सूर्य का प्रचंड तेज़
पत्ती की शक्ति क्षीण हुई
आग की लपटों में वह
डाली की याद में जल गई
स्वाहा हुई_______

लौट आती है बाहार फ़िरसे
नई पत्तियों से शाख़े सज़के
ना करता शाख़ उस पत्ती को याद
जितनी किस्मत बस उतना साथ~!!!

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5 comments:

mohan intzaar said...

बहुत भावपूर्ण रचना ...सादर

निभा said...

शुक्रिया मोहन जी~!!!

निभा said...

सर चर्चा मंच में शामिल करने हेतु आभार आपका~!!!

Onkar said...

सच कहा

निभा said...

शुक्रिया सहमत होने के लिए~!!!

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